रविवार, 17 फ़रवरी 2013

संस्कार का अर्थ


संस्कार का अर्थ जीवन को विशेष ढंग से क्रियापूर्ण बनाकर सुदृढ़ता से पालन करने में है. मनुष्य का जीवन उसके बीज से लगाकर अंत में मरण के बाद तक विधानपूर्वक किए जाने का मत रखकर कुछ उपाय सुझाए गए है. इन्ही उपायों को जीवन के विभिन्न खण्डों में बाँटते हुए सोलह संस्कारों के स्वरूपमे निर्दिष्ट किया गया है. सोलह संस्कारों को भी पूर्वार्ध और उत्तरार्ध में विभक्त किया गया है.
आश्रम व्यवस्था के अंतर्गत मनुष्य जीवन विधि का अनुसरण करता है तो वह सक्षम तथा संवर्धक , पोषक एवं पुष्टिकारक परम्परा का स्थायित्व सुनिश्चित करता है. भारतीय मनीषियों ने पाया कि विशेष प्रकार से आचरण में लाते हुए यदि क्रियाए कि जाती है तो वे पुष्टिकारक बनती है. किस प्रकार के आचरण सक्षम जीवन कि उर्जा हैं? इनको अपनाने से क्या होता है ? जैसे प्रश्नों पर ग्रन्थ निर्मित हुए और आचरणशैली का मार्गदर्शन पर्स्तुत हुआ. ये आचरण ही संस्कारों को ध्वनित किए गए प्रतीत होते है.
आईये इन संस्कारों पर नज़र डालें :
१ गर्भाधान संस्कार
२ पुंसवन संस्कार
३ सीमन्तोन्नयन संस्कार
४ जातकर्म संकार
५ नामकरण संस्कार
६ निष्क्रमण संस्कार
७ अन्नप्राशन संस्कार
८ चूड़ाकर्म संस्कार
९ कर्न्विध संस्कार
१० उपनयन संस्कार
११ वेदारम्भ संस्कार
१२ समावर्तन संस्कार
१३ विवाह संस्कार
१४ वानप्रस्थ संस्कार
१५ संन्यास संस्कार
१६ अंत्येष्टि संस्कार

जिस प्रकार कृषक खेत में कर्म करते हुए बीज बोकर निरंतर निगरानी रखते हुए उत्कृष्टतम फसल को प्राप्त  करने के लिए लगा रहता है. बीज को जमीं में रखने के पश्चात, पानी की मात्रा, खाद का पोषण, कीट नियंत्रण एवं विभिन्न औषधियों का दिया जाना एक विशेष प्रक्रिया से किया जाता है उसी तरह परिवार का वर्धन प्राप्त करने कि नियमावली को संकार के रूप में माना जा सकता है. आधुनिक होते विचारों में पद्धतियों में फेर बदल हुए इसी तरह मनुष्य के पालन में संस्कारों की भूमिका और उसमे परिवर्तन की अवश्यकताओ को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता.
संस्कारों की गर्त में हमें सम्पूर्ण मानसिक नियंत्रण में कार्यों की प्रेरणा दी गई है आश्चर्य नहीं की पशुओं में जिस प्रकार स्वभावगत संस्कार है वे विशेष मौसम की अनुकूलता के साथ अपनी वृद्धि करते दीख पड़ते है, उन्हें मनुष्य के लिए विशेष बातों का ध्यान रखने भक्ष्य तथा अभक्ष्य का सन्देश भी इन संस्कारों के माध्यम से प्रस्तुत करना पड़ा है.
माना कि उपनयन संस्कार से अगली पीढ़ी को संस्कारित कराया जाना एक आवश्यक जीवन कड़ी के रूप में अभिव्यक्त है. तथापि जिन्हें संस्कारों का बोध है वे अपने उत्तरार्ध संस्कारों से निवृत्त बने रहना चाहते है. लोग चाहते है कि उनकी पीढ़ी संस्कारित हो मगर अपनी ओर वे संस्कारों कि मान्यता नकारते दिखते है. समाज में ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थाश्रम तथा सन्यासाश्रम के भेद में वे उपनयन तथा वेदारम्भ से ब्रह्मचर्याश्रम और समावर्तन व् विवाह संस्कार से गृहस्थाश्रम को पोषण देने तक को अपना क्रम पूर्ण समझते है परन्तु जिन संस्कारों का धारण स्वयं को करना है उनसे विमुख हो जाते है. जब अपसंस्कारित होकर अपमान को महसूस करते है उस वक्त भी मात्र अपने अंतिम यानी अंत्येष्टि का मंत्र्पूर्वक होना मन में धरे रहते है.
अब चूँकि बात उपनयन संस्कार कि हो रही है तब विचार उपजना स्वाभाविक ही है कि जीवन के उत्तरार्ध संस्कारों को हमारी पूर्व पीढ़ी ने अंगीकार कहां किया? यदि किया होता तो अनेको संस्कारित वानप्रस्थी और सन्यासी पूर्ण आदर को प्राप्त होते.
आज बुजुर्गो से प्रायः सुनाने में आ रहा है कि बेटे ध्यान नहीं दे रहे. खैर !
 उपनयन संस्कार को ठीक प्रकार समझाने कि आवश्यकता है. इस दसवे संस्कार के पूर्व के नौ संस्कार भी जानने कि जरूरत है क्योंकि ये समस्त संस्कार सभी मनुष्यों के लिए है स्त्री पुरुष का भेद भी यहाँ नहीं है.......

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